माना ये सच है - 'परिवर्तन होता इस जग में
प्रकृति बदलती है
दिन की स्वर्ण तरी में बैठी
रात मचलती है'
फिर भी, हद हो गई ! आज की लाइफ स्टाइल को देखकर लगता है भारत में अमेरिकाउतर आया है. सर से पांव तक आधुनिकता की होड़ लगी है. नैतिकता की बातें विस्मृतहो चुकी हैं. वर्जनाएं रद्दी की टोकरी में फ़ेंक दी गयी हैं . अश्लील क्या होता है-कुछ नहीं .संस्कार की बातें दकियानूसी लगने लगी हैं. एक-दूसरे को लांघकर आगे निकल जाने कीऐसी होड़ लगी है,कि फैलती कामनाओं के बीच भावनाएं दब गयी हैं. जीने को अपनेनिजी विचार , अपना घेरा है . इसमें औरों का कोई स्थान नहीं . संबंधों की एक गरिमाहुआ करती थी,आज के सन्दर्भ में उसका कोई स्थान नहीं. वेश-भूषा , खान-पानजीवनचर्या में भारत महान कहीं नज़र नहीं आता . जिस हिंदी पर हमें नाज था,वहपिछडे लोगों की भाषा बनती जा रही है .शिष्टता , आदर-सम्मान,व्यवहार,बोली- जोव्यक्ति की सुन्दरता मानी जाती थी,उस पर आडम्बर का लेप लग गया है. लज्जा, जोनारी का आभूषण था , आज की लाइफ स्टाइल में कुछ इस तरह गुम हुआ कि कहींभीड़ में जाओ तो लगता है कि अपना-आप गुम हो गया है और खुद की आँखें ही शर्माजाती हैं . भागमभाग का ऐसा समां है कि न किसी से कुछ पूछने का समय है और नअपनी कह सुनाने की कोई जगह रही.....
आलम है - ' आधुनिकता ओढ़कर हवा भी बेशर्म हो गई है
उसकी बेशर्मी देख गधे
जो कल तक ढेंचू-ढेंचू करते थे
आज सीटियाँ बजाने लगे हैं
गिलहरी डांस की हर विधा अपनाने को तैयार है
पर कुत्तों को अब किसी चीज में दिलचस्पी नहीं
वे अपनी मूल आदत त्याग कर
भरी भीड़ में सो रहे हैं
समय का नजारा देखते जाओ
रुको नहीं , चलते जाओ
अब 'क्यों' का प्रश्न बेकार है !
प्रकृति बदलती है
दिन की स्वर्ण तरी में बैठी
रात मचलती है'
फिर भी, हद हो गई ! आज की लाइफ स्टाइल को देखकर लगता है भारत में अमेरिकाउतर आया है. सर से पांव तक आधुनिकता की होड़ लगी है. नैतिकता की बातें विस्मृतहो चुकी हैं. वर्जनाएं रद्दी की टोकरी में फ़ेंक दी गयी हैं . अश्लील क्या होता है-कुछ नहीं .संस्कार की बातें दकियानूसी लगने लगी हैं. एक-दूसरे को लांघकर आगे निकल जाने कीऐसी होड़ लगी है,कि फैलती कामनाओं के बीच भावनाएं दब गयी हैं. जीने को अपनेनिजी विचार , अपना घेरा है . इसमें औरों का कोई स्थान नहीं . संबंधों की एक गरिमाहुआ करती थी,आज के सन्दर्भ में उसका कोई स्थान नहीं. वेश-भूषा , खान-पानजीवनचर्या में भारत महान कहीं नज़र नहीं आता . जिस हिंदी पर हमें नाज था,वहपिछडे लोगों की भाषा बनती जा रही है .शिष्टता , आदर-सम्मान,व्यवहार,बोली- जोव्यक्ति की सुन्दरता मानी जाती थी,उस पर आडम्बर का लेप लग गया है. लज्जा, जोनारी का आभूषण था , आज की लाइफ स्टाइल में कुछ इस तरह गुम हुआ कि कहींभीड़ में जाओ तो लगता है कि अपना-आप गुम हो गया है और खुद की आँखें ही शर्माजाती हैं . भागमभाग का ऐसा समां है कि न किसी से कुछ पूछने का समय है और नअपनी कह सुनाने की कोई जगह रही.....
आलम है - ' आधुनिकता ओढ़कर हवा भी बेशर्म हो गई है
उसकी बेशर्मी देख गधे
जो कल तक ढेंचू-ढेंचू करते थे
आज सीटियाँ बजाने लगे हैं
गिलहरी डांस की हर विधा अपनाने को तैयार है
पर कुत्तों को अब किसी चीज में दिलचस्पी नहीं
वे अपनी मूल आदत त्याग कर
भरी भीड़ में सो रहे हैं
समय का नजारा देखते जाओ
रुको नहीं , चलते जाओ
अब 'क्यों' का प्रश्न बेकार है !